लॉकडाउन के संकट में बने थे जरूरतमंदों का सहारा, आज भी समाजसेवा के लिए समर्पित हैं रमेश खीरवाल

निस्वार्थ सेवा, भाईचारे और जनहित के कार्यों से बनाई अलग पहचान, शहर के विकास को लेकर चुनावी मैदान में उतरे थे  

सुजीत कुमार

चाईबासा

समाज में कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो अपनी पहचान पद और प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि अपने सेवा भाव और नेक कार्यों से बनाते हैं। ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी हैं रमेश खीरवाल, जिन्होंने कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन की कठिन घड़ी में जरूरतमंदों की मदद कर समाजसेवा की एक मिसाल पेश की थी। जब पूरी दुनिया महामारी के संकट से जूझ रही थी और आम लोगों के सामने रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने की चुनौती थी, तब रमेश खीरवाल जरूरतमंदों की सहायता के लिए आगे आए थे।
रमेश ख़िरवाल                                                         लॉकडाउन के दौरान उन्होंने शहर के विभिन्न इलाकों और मोहल्लों में पहुंचकर लोगों की समस्याओं को समझा। संक्रमण से बचाव के लिए सैनिटाइजर समेत जरूरी सामान उपलब्ध कराने के साथ ही उन्होंने अपनी निजी राशि से जरूरतमंद परिवारों के बीच आवश्यक वस्तुओं का वितरण किया। खास बात यह रही कि उन्होंने इस दौरान किसी से आर्थिक सहयोग नहीं मांगा और न ही किसी तरह की मदद की अपेक्षा की। अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन्होंने जरूरतमंदों की सहायता की और कठिन समय में लोगों का सहारा बने।

रमेश खीरवाल की समाजसेवा केवल कोरोना काल तक ही सीमित नहीं रही। उनका मानना है कि समाज के हर वर्ग और हर समुदाय के लोगों के साथ भाईचारे और आत्मीयता का रिश्ता होना चाहिए। यही वजह है कि वे सभी को अपने परिवार का हिस्सा मानकर चलते हैं। उनके लिए समाजसेवा किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि हर जरूरतमंद की मदद करना उनकी प्राथमिकता रही है।

उनके व्यक्तित्व की एक खास विशेषता यह भी है कि वे अपनी ओर से किए गए सहयोग का प्रचार-प्रसार करने से परहेज करते हैं। जरूरतमंदों की मदद करना वे अपना सामाजिक दायित्व मानते हैं। उनका मानना है कि सच्ची सेवा वही है, जिसमें किसी प्रकार के स्वार्थ या दिखावे की भावना न हो।

शहर के विकास को लेकर भी रमेश खीरवाल की अपनी एक स्पष्ट सोच रही है। इसी सोच के साथ उन्होंने चुनावी मैदान में कदम रखा था। उनका उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि शहर की बुनियादी समस्याओं का समाधान कराना और नागरिकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना था। शहर की प्रत्येक गली और मोहल्ले में सड़क एवं नाली का निर्माण, घर-घर स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था तथा चौक-चौराहों पर रोशनी जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहा है।

हालांकि, चुनाव के बाद उन्हें अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिल सका, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने शहर और शहरवासियों के हित में काम करना नहीं छोड़ा। उनका कहना है कि जनसेवा किसी चुनाव या पद की मोहताज नहीं होती। शहर की समस्याओं को दूर करने और लोगों की मदद करने का उनका प्रयास आज भी जारी है।

रमेश खीरवाल का व्यक्तित्व इस बात को दर्शाता है कि समाजसेवा के लिए किसी पद या राजनीतिक पहचान की आवश्यकता नहीं होती। जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशीलता, सभी समुदायों के प्रति समान व्यवहार और जनहित के लिए निरंतर प्रयास ही किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान बनाते हैं।

आज जब समाज में स्वार्थ और दिखावे की चर्चा आम है, ऐसे में रमेश खीरवाल के समर्थक उनके सेवा भाव और समर्पण को याद करते हुए लोगों से उनके योगदान को पहचानने की अपील कर रहे हैं। उनका मानना है कि लॉकडाउन जैसे कठिन दौर में जरूरतमंदों के साथ खड़े रहने वाले लोगों के योगदान को भुलाया नहीं जाना चाहिए।

रमेश खीरवाल की समाजसेवा की कहानी केवल एक व्यक्ति के प्रयासों की कहानी नहीं, बल्कि उस मानवीय संवेदना की भी मिसाल है, जो संकट के समय लोगों को एक-दूसरे का सहारा बनने की प्रेरणा देती है।

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