हाथियों के भय से शुरू हुई मुसाबनी की पहली दुर्गा पूजा, अंग्रेज अफसर ने दिया था 55 रुपये का सहयोग

1937 से बाबू लाइन में अनवरत हो रही मां दुर्गा की आराधना, कभी घाटशिला जाते समय हाथियों के झुंड से हुआ था सामना; आज भी कायम है आस्था, परंपरा और सामुदायिक एकजुटता की अनूठी मिसाल

रणधीर कुमार सिंह

मुसाबनी।

शक्ति की अधिष्ठात्री मां दुर्गा की आराधना भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में बसे भारतीय समुदायों के बीच भी श्रद्धा और उल्लास के साथ की जाती है। कोई परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना लेकर मां के दरबार में पहुंचता है, तो कोई अपनी कुल-परंपरा और धार्मिक मान्यताओं का निर्वहन करता है। लेकिन पूर्वी सिंहभूम जिले के मुसाबनी प्रखंड में मां दुर्गा की आराधना की शुरुआत की कहानी बेहद दिलचस्प और अनूठी है।

यहां की पहली दुर्गा पूजा हाथियों के भय से जुड़ी एक घटना के बाद शुरू हुई थी। दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 1937 में शुरू हुई इस पूजा के आयोजन में ब्रिटिश शासन के एक अधिकारी ने भी आर्थिक सहयोग दिया था। करीब नौ दशक से बाबू लाइन में अनवरत आयोजित हो रही यह पूजा आज भी आस्था, परंपरा और सामाजिक एकजुटता की मिसाल बनी हुई है।

हाथियों के झुंड ने बदली पूजा की परंपरा

बाबू लाइन दुर्गा पूजा समिति के पूर्व अध्यक्ष एवं एचसीएल के पूर्व अधिकारी मुरली सरकार तथा समिति के सदस्य एचडी सरकार के अनुसार, वर्ष 1937 से पहले मुसाबनी के लोग मां दुर्गा के दर्शन के लिए घाटशिला जाते थे। वहां धालभूम के राजा धवलदेव द्वारा आयोजित दुर्गा पूजा में शामिल होने की परंपरा थी।

बताया जाता है कि एक बार बाबू लाइन के कुछ परिवार ब्रिटिश सरकार की कंपनी आईसीसी (वर्तमान में एचसीएल) की ओर से उपलब्ध कराए गए ट्रक से रात के समय घाटशिला में दुर्गा पूजा देखने जा रहे थे। उस दौर में रास्ते का अधिकांश हिस्सा घने जंगलों से होकर गुजरता था। यात्रा के दौरान मेढ़िया गांव के समीप अचानक हाथियों का एक झुंड ट्रक के सामने आकर खड़ा हो गया।

घनघोर अंधेरी रात में हाथियों के झुंड को सामने देखकर ट्रक में सवार महिला-पुरुष और उनके परिवार के सदस्य घबरा गए। काफी देर तक इंतजार करने के बावजूद जब हाथियों का झुंड रास्ते से नहीं हटा, तो सभी ने मां दुर्गा का स्मरण कर अपनी सुरक्षा की प्रार्थना की। बताया जाता है कि कुछ समय बाद हाथियों के झुंड ने रास्ता छोड़ दिया और ट्रक सवार लोग सुरक्षित आगे बढ़ सके।

इस घटना के बाद लोगों ने घाटशिला जाकर पूजा देखने के बजाय मुसाबनी के बाबू लाइन में ही मां दुर्गा की पूजा शुरू करने का निर्णय लिया। इसके लिए धालभूम के राजा धवलदेव से अनुमति मांगी गई, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। इसके बाद वर्ष 1937 में बाबू लाइन में पहली बार शारदीय दुर्गा पूजा का आयोजन हुआ। इस प्रकार भय और संकट से जुड़ी एक घटना ने मुसाबनी में एक नई धार्मिक परंपरा की नींव रख दी।

अंग्रेज माइंस सुपरिटेंडेंट ने दिए थे 55 रुपये

बाबू लाइन की पहली दुर्गा पूजा के आयोजन में आर्थिक सहयोग की कहानी भी इस परंपरा को खास बनाती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, तत्कालीन आईसीसी कंपनी के पहले ब्रिटिश माइंस सुपरिटेंडेंट मिस्टर डोमेस्टर ने पूजा के लिए 55 रुपये का आर्थिक सहयोग दिया था। वहीं, स्थानीय लोगों ने आपसी सहयोग से 19 रुपये जुटाए थे। इस तरह कुल 74 रुपये की शुरुआती राशि से मां दुर्गा की पूजा का आयोजन किया गया।

पूजा समिति के पहले अध्यक्ष जीपी बनर्जी बनाए गए थे। उनके नेतृत्व में शुरू हुई पूजा धीरे-धीरे बाबू लाइन की पहचान बन गई। उस समय मुसाबनी की तांबे की खदानों का संचालन करने वाले ब्रिटिश अधिकारियों ने भी इस आयोजन में लगातार सहयोग किया।

माइंस अधिकारियों मिस्टर माइकल डोमेस्टर, डी. जैकब, मिस्टर हिल, मिस्टर ब्राउटन, मिस्टर बे, मिस्टर फर्गुसन और अंतिम सुपरिटेंडेंट मिस्टर न्यूजेंट ने विभिन्न वर्षों में पूजा के आयोजन में मदद की। बताया जाता है कि ब्रिटिश अधिकारियों के सहयोग से पूजा के लिए एक भव्य शेड भी बनवाया गया था, जो आज भी मजबूती से खड़ा है और इस ऐतिहासिक परंपरा की गवाही देता है।

पंडाल निर्माण के लिये पूजन करते केमती के महिला पुरुष सदस्य

कुटू बाबू ने बनाई थी पहली प्रतिमा

बाबू लाइन की दुर्गा पूजा का इतिहास यहां की पहली प्रतिमा से भी जुड़ा हुआ है। वर्ष 1937 में मां दुर्गा की प्रतिमा तत्कालीन मूर्तिकार पूर्णचंद्र नमाता ने बनाई थी। वे बानालोपा तांबा खदान में लोको इंचार्ज के रूप में कार्यरत थे। बताया जाता है कि बानालोपा की खदान उस दौर में एशिया की सबसे बड़ी तांबा खदानों में गिनी जाती थी। पूर्णचंद्र नमाता बाबू लाइन में ही रहते थे और क्षेत्र के मजदूर तथा स्थानीय लोग उन्हें सम्मानपूर्वक ‘कुटू बाबू’ कहकर बुलाते थे।

उनके द्वारा शुरू की गई प्रतिमा निर्माण की परंपरा और पूजा की विशिष्ट पहचान समय के साथ कायम रही। आज भी यहां मां दुर्गा की प्रतिमाएं पारंपरिक ‘एकचाली’ शैली में बनाई जाती हैं। इस शैली में मां दुर्गा और उनके साथ विराजमान देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को एक ही सजावटी पृष्ठभूमि में प्रदर्शित किया जाता है।

पंडाल निर्माण को भूमि पूजन करते कमेटी के सदस्य

प्रतिमा का पैटर्न बदला, फिर लौटी पुरानी परंपरा

बाबू लाइन की दुर्गा पूजा से जुड़ी एक और रोचक मान्यता प्रतिमा की बनावट को लेकर है। समिति के पूर्व अध्यक्ष मुरली सरकार के अनुसार, वर्ष 2008 और 2009 में पूजा समिति के युवाओं ने प्रतिमा का पारंपरिक पैटर्न बदल दिया था। इसी दौरान वर्ष 2008 में पूजा के समय मां दुर्गा के बालों में आग लगने की घटना हुई, जबकि वर्ष 2009 में सिंदूर खेला के दौरान मां की साड़ी में आग लग गई थी।

बाबुलाइन दुर्गा पूजा मंडप में बनी मां दुर्गा की आकर्षक प्रतिमा

इन घटनाओं के बाद समिति ने फिर से पुराने ‘एकचाली’ डिजाइन में ही प्रतिमाएं बनवाने का निर्णय लिया। तब से पारंपरिक शैली में ही प्रतिमा निर्माण की परंपरा जारी है। श्रद्धालुओं के लिए यह परंपरा केवल प्रतिमा की बनावट नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।

खदानें बंद हुईं, आर्थिक संकट आया, लेकिन पूजा नहीं रुकी

मुसाबनी कभी तांबा खनन और औद्योगिक गतिविधियों के कारण एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र के रूप में जाना जाता था। मुसाबनी, सुरदा, पाथरगोड़ा, बानालोपा, केंदाडीह और राखा सहित आसपास की खदानों से बड़ी संख्या में मजदूरों और कर्मचारियों की आजीविका जुड़ी हुई थी।

समय के साथ तांबा उद्योग में आर्थिक चुनौतियां बढ़ीं। वर्ष 1990 के दशक में खनन गतिविधियों में आई गिरावट और लागत संबंधी समस्याओं के बीच एचसीएल के मुसाबनी ग्रुप ऑफ माइंस की कई खदानों में काम बंद होने तथा कर्मचारियों के वीआरएस लेने से क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा। बड़ी संख्या में मजदूरों और परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई और मुसाबनी में आर्थिक संकट गहरा गया।

दुर्गा पूजा के लिए बना आकर्षक पूजा पंडाल

इसका असर दुर्गा पूजा के आयोजन पर भी पड़ा। पहले जहां बाजार और शहर के विभिन्न हिस्सों से चंदा जुटाया जाता था, वहीं आर्थिक कठिनाइयों के कारण बाबू लाइन के लोगों ने बाहरी चंदा संग्रह बंद कर दिया। अब कॉलोनी के निवासी आपसी सहयोग, चंदा और सदस्यता शुल्क के माध्यम से पूजा का आयोजन करते हैं।

आर्थिक संसाधनों की कमी के बावजूद पूजा का सिलसिला कभी नहीं टूटा। स्थानीय लोगों की सामूहिक भागीदारी ने साबित किया कि धार्मिक आस्था केवल भव्य सजावट और बड़े बजट की मोहताज नहीं होती, बल्कि लोगों के विश्वास, समर्पण और सहयोग से ही परंपराएं जीवित रहती हैं।

युवाओं और सभी वर्गों के सहयोग से भव्य आयोजन

वर्तमान में बाबू लाइन दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष नवीन महाली हैं, जो झारखंड सरकार के जल संसाधन विभाग में कार्यपालक अभियंता हैं और बाबू लाइन के निवासी भी हैं। समिति के सचिव बाप्पी भद्रो तथा कोषाध्यक्ष शिबू भगत हैं। इनके नेतृत्व में मुसाबनी नंबर-01 के युवाओं और विभिन्न वर्गों के लोगों के सहयोग से इस वर्ष भी दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है।

करीब नौ दशक की इस यात्रा में बाबू लाइन की दुर्गा पूजा ने कई दौर देखे हैं। ब्रिटिश शासन का समय, तांबा खदानों की रौनक, औद्योगिक संकट और आर्थिक चुनौतियां—इन सबके बीच मां दुर्गा की आराधना की लौ लगातार जलती रही है।

आज बाबू लाइन की दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मुसाबनी के इतिहास, औद्योगिक विरासत, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक एकता की जीवंत कहानी है। हाथियों के भय से शुरू हुई यह परंपरा अब पीढ़ियों की आस्था का प्रतीक बन चुकी है। बदलते समय और परिस्थितियों के बावजूद मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा का यह संगम आज भी मुसाबनी के लोगों को एक सूत्र में बांधे हुए है।

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